Wednesday, 9 November 2016

परिचित ~ डा. रामनिवास मानव

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परिचित


बस में छूट जाने के कारण, पुलिस ने उसका सामान, अपने कब्ज़े में ले लिया था। अब, किसी परिचित आदमी की ज़मानत के बाद ही, वह सामान उसे मिल सकता था।

“मेरी पत्नी सख़्त बीमार है। मेरा जल्दी घर पहुंचना बहुत ज़रूरी है होल्दार सा’ब !” उसने विनती की।

“भई, कह तो दिया, किसी जानकार आदमी को ढूंढकर ले आओ और ले जाओ अपना सामान।”

“मैं तो परदेसी आदमी हूं। सा’ब, दो सौ मील दूर के शहर में कौन मिलेगा मुझे जानने वाला !”

“यह हम नहीं जानते। देखो, यह तो कानूनी ख़ाना-पूर्ति है। बिना ख़ाना-पूर्ति किये हम सामान तुम्हें कैसे दे सकते हैं ?”

वह समझ नहीं पा रहा था कि ख़ाना-पूर्ति कैसे हो ।

कुछ सोचकर, उसने दस रुपये का नोट निकाला और चुपके-से, कॉन्स्टेबुल की ओर बढा दिया। नोट को जेब में खिसकाकर, उसे हल्की-सी डांट पिलाते हुए, कॉन्स्टेबुल ने कहा- “तुम शरीफ़ आदमी दिखते हो, इसलिए सामान ले जाने देता हूं। पर फिर ऐसी ग़लती मत करना, समझे !”
दस के नोट ने, कॉन्स्टेबुल को ही, परिचित बना दिया था।

डा. रामनिवास मानव  




साभार : भारत-दर्शन -ऑनलाइन हिंदी साहित्यिक पत्रिका

बंद दरवाज़ा ~ मुंशी प्रेमचंद

यहां सुनें ➤ Band Darwaza - Audio

बंद दरवाज़ा 

सूरज क्षितिज की गोद से निकला, बच्चा पालने से। वही स्निग्धता, वही लाली, वही खुमार, वही रोशनी।

मैं बरामदे में बैठा था। बच्चे ने दरवाजे से झांका। मैंने मुस्कुराकर पुकारा। वह मेरी गोद में आकर बैठ गया।

उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढ़ाया, कभी कागज पर। मैंने गोद से उतार दिया। वह मेज का पाया पकड़े खड़ा रहा। घर में न गया। दरवाजा खुला हुआ था।

एक चिड़िया फुदकती हुई आई और सामने के सहन में बैठ गई। बच्चे के लिए मनोरंजन का यह नया सामान था। वह उसकी तरफ लपका। चिड़िया जरा भी न डरी। बच्चे ने समझा अब यह परदार खिलौना हाथ आ गया। बैठकर दोनों हाथों से चिड़िया को बुलाने लगा। चिड़िया उड़ गई, निराश बच्चा रोने लगा। मगर अंदर के दरवाजे की तरफ ताका भी नहीं। दरवाजा खुला हुआ था।

गरम हलवे की मीठी पुकार आई। बच्चे का चेहरा चाव से खिल उठा। खोंचेवाला सामने से गुजरा। बच्चे ने मेरी तरफ याचना की आँखों से देखा। ज्यों-ज्यों खोंचेवाला दूर होता गया, याचना की आँखें रोष में परिवर्तित होती गईं। यहाँ तक कि जब मोड़ आ गया और खोंचेवाला आँख से ओझल हो गया तो रोष ने पुरजोर फरियाद की सूरत अख्तियार की। मगर मैं बाजार की चीजें बच्चों को नहीं खाने देता। बच्चे की फरियाद ने मुझ पर कोई असर न किया। मैं आगे की बात सोचकर और भी तन गया। कह नहीं सकता बच्चे ने अपनी माँ की अदालत में अपील करने की जरूरत समझी या नहीं। आमतौर पर बच्चे ऐसे हालातों में माँ से अपील करते हैं। शायद उसने कुछ देर के लिए अपील मुल्तवी कर दी हो। उसने दरवाजे की तरफ रुख न किया। दरवाजा खुला हुआ था।

मैंने आँसू पोंछने के ख्याल से अपना फाउंटेनपेन उसके हाथ में रख दिया। बच्चे को जैसे सारे जमाने की दौलत मिल गई। उसकी सारी इंद्रियाँ इस नई समस्या को हल करने में लग गईं। एकाएक दरवाजा हवा से खुद-ब-खुद बंद हो गया। पट की आवाज बच्चे के कानों में आई। उसने दरवाजे की तरफ देखा। उसकी वह व्यस्तता तत्क्षण लुप्त हो गई। उसने फाउंटेनपेन को फेंक दिया और रोता हुआ दरवाजे की तरफ चला क्योंकि दरवाजा बंद हो गया था। 

~ मुंशी प्रेमचंद 






साभार : भारत-दर्शन -ऑनलाइन हिंदी साहित्यिक पत्रिका

धरती का पहला प्रेमी


यहाँ सुनें ➤  Dharti ka Pahla Premi - Audio


धरती का पहला प्रेमी 


एडिथ सिटवेल ने
सूरज को धरती का

पहला प्रेमी कहा है


धरती को सूरज के बाद

और शायद पहले भी
तमाम चीज़ों ने चाहा



जाने कितनी चीज़ों ने

उसके प्रति अपनी चाहत को
अलग-अलग तरह से निबाहा



कुछ तो उस पर

वातावरण बनकर छा गए
कुछ उसके भीतर समा गए
कुछ आ गए उसके अंक में



मगर एडिथ ने

उनका नाम नहीं लिया
ठीक किया मेरी भी समझ में



प्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों ने

मगर प्रेम किया सबसे पहले
उसे सूरज ने



प्रेमी के मन में

प्रेमिका से अलग एक लगन होती है
एक बेचैनी होती है
एक अगन होती है
सूरज जैसी लगन और अगन
धरती के प्रति
और किसी में नहीं है



चाहते हैं सब धरती को

अलग-अलग भाव से
उसकी मर्ज़ी को निबाहते हैं
खासे घने चाव से



मगरप्रेमी में

एक ख़ुदगर्ज़ी भी तो होती है
देखता हूँ वह सूरज में है



रोज़ चला आता है

पहाड़ पार कर के
उसके द्वारे
और रुका रहता है
दस-दस बारह-बारह घंटों



मगर वह लौटा देती है उसे

शाम तक शायद लाज के मारे


और चला जाता है सूरज

चुपचाप
टाँक कर उसकी चूनरी में
अनगिनत तारे
इतनी सारी उपेक्षा के
बावजूद।

~ भवानी प्रसाद मिश्र 


Tuesday, 8 November 2016

आख़री हिचकी ~ फ़ुर्सतनामा




सबके नोटों को भजाना चाहते हैं, 
हज़ार-पाँच सौ को हटाना चाहते हैं। 

यूँ अचानक बैन नोटों पर लगाकर,
ब्लैक को वाइट बनाना चाहते हैं।

छा रहा है पूँजीपतियों पर अँधेरा,
कैसे भी, काला धन बचाना चाहते हैं।

आख़री हिचकी जाली नोटों की आयी - 
मौत भी उनकी शायराना चाहते हैं। 


~ फ़ुर्सतनामा 


©Fursatnama 
 
***एनी रिसेम्ब्लेंस टू क़तील शिफ़ाई'स ग़ज़ल इज़ प्योरली इन्टेंशनल। 

Monday, 31 October 2016

रंगोली ~ फ़ुर्सतनामा




अपने आँगन में सजाना चाहती हूँ,
आ तुझे मैं ख़ुद बनाना चाहती हूँ। 

रंग सारे तेरे दामन पर गिरा कर,
बूँद से सागर बनाना चाहती हूँ। 

थक गयी मैं भरते भरते रंग तुझमें, 
तेरे रंगों में अब रंग जाना चाहती हूँ।  

छा गया है दूर क्षितिज पर अँधेरा,
रौशनी कर, वह भगाना चाहती हूँ।  

आज सारे दीप तुझमें झिलमिलायें,
दिवाली, मैं यूँ मनाना चाहती हूँ। 

~ फ़ुर्सतनामा 



Rangoli



Apane aangan meiN sajaana chaahtii hooN
Aa tujhe maiN khud banana chaahtii hooN

Rang saare tere daaman par giraa kar
Boond se saagar banana chaahtii hooN

Thak gayii maiN bharte bharte rang tujhmeiN
Tere rangoN meiN ab rang jaana chaahtii hooN

Chha gaya hai door kshitij par andhera
Raushni kar wah bhagaana chaahtii hooN 

Aaj saare deep tujhmeiN jhilmilaaye
Diwali, maiN yuuN manana chaahtii hooN!

~Fursatnama 


©Fursatnama

Friday, 28 October 2016

चयन आपका है ~ फ़ुर्सतनामा


फ़ुर्सतनामा के सभी मित्रों को दीपावली की शुभ कामनायें! स्वस्थ रहें, सकुशल रहें, सानन्द रहें !


©Fursatnama

दिए जलाइये, दिल नहीं ~ फ़ुर्सतनामा

 
 

 
 इस दिवाली दिए जलाइये, दिल नहीं,
इंसान हैं, बेरहम क़ातिल नहीं। 
 
 
रौशन चराग़-ए-ज़िन्दगी करिये,
काम इतना यूँ भी ये मुश्किल नहीं। 
 
 
चादर जो आपकी है, मापते  चलिए,
फैलाइये ना पाँव, ग़र हासिल नहीं। 
 
 
 अपनी हैसियत से घर सजाइये अपना,
घर है, ग़ैर की महफ़िल नहीं।   
 
  
अच्छे न लगें तो मत फोड़िये पटाखे,
अक्लमंद कहलायेंगे,बुज़दिल नहीं। 
 
 
त्यौहार सारे बस चराग़-ए-राह हैं,
ज़िंदगी की आख़िरी मंज़िल नहीं।
 
~ फ़ुर्सतनामा 
 
 
©Fursatnama